Sunday, November 4, 2012

ढह गया पतझड़ में हर बहार का घर...

क्यों बनाया रेत में इक प्यार का घर,
ज़माने की लहरों में बचे दो-चार घर।

अभी तूफ़ान था,अभी ये ख़ामोशी है,
ढह गया पतझड़ में हर बहार का घर।

दर्द भरे सपने हैं और लम्बी ज़िन्दगी,
कट रहा है चौखट पे इंतज़ार का घर।

सुधियों का ब्याज ही बनता है मूलधन,
इतनी मंहगाई में उजड़ता बाज़ार का घर।

घर अपना बेच दिया चुपचाप किश्तों में,
ये जिसमे रहते हैं,ये तो है उधार का घर।

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