Sunday, November 4, 2012

ऐसे मन कब तलक हम बहलाएँगे...

वो अगर ज़िन्दगी से चले जायेंगे,
फिर हमें वो किस तरह तड़पायेंगे।

साथ के वास्ते हो यहाँ साथ कोई,
ऐसे मन कब तलक हम बहलाएँगे।

क्यों अभी से कारवां को रोकते हो ,
कैसे ये यहाँ अपनी मंजिलें पाएंगे।

आसपास यहाँ बहरे लोग रहते हैं,
हाले-दिल किस तरह समझायेंगे।

उठ गया एक शख्स हम सा गर,
किस तरह वे महफ़िलें सजायेंगे।
(21 April, 1977)

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