ज़िन्दगी को हम एक करिश्मा ही कहते हैं,
तभी जाने क्या-क्या दुःख-दर्द सहते रहते हैं।
उठने लगा है छतों से कुछ धुँआ-धुंआ सा,
लोग भी झुलसते हुए घरों में क्यों रहते हैं।
ज़माने की हवा ने कुछ इस तरह संवारा है,
जिधर को बहा दिया, हम उधर ही बहते हैं।
बहुत पक्की हैं अपने घर की सारी दीवारें,
हम चुपचाप मगर तिल-तिल कर ढहते हैं।
जो हमें देखते हैं रोज अपने सपनों में,
पूछ रहे हमसे हम आजकल कहाँ रहते हैं।
(12 March, 1975)
तभी जाने क्या-क्या दुःख-दर्द सहते रहते हैं।
उठने लगा है छतों से कुछ धुँआ-धुंआ सा,
लोग भी झुलसते हुए घरों में क्यों रहते हैं।
ज़माने की हवा ने कुछ इस तरह संवारा है,
जिधर को बहा दिया, हम उधर ही बहते हैं।
बहुत पक्की हैं अपने घर की सारी दीवारें,
हम चुपचाप मगर तिल-तिल कर ढहते हैं।
जो हमें देखते हैं रोज अपने सपनों में,
पूछ रहे हमसे हम आजकल कहाँ रहते हैं।
(12 March, 1975)
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